विकसित भारत में अनुसंधान एवं नवाचार की भूमिका पर हुआ विमर्श
रीवा। प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय, रीवा में भारतीय शिक्षण मंडल, महाकौशल प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में 21 फरवरी 2026 को “ विकसित भारत में अनुसंधान एवं नवाचार की भूमिका ” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन स्वामी विवेकानंद सभागार में किया गया, जिसमें शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर विस्तृत चर्चा हुई।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आचार्य राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी, कुलगुरु, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भारतीय शिक्षण मंडल, विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. सुरेन्द्र सिंह परिहार, कुलसचिव, अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा एवं प्रांत उपाध्यक्ष, भारतीय शिक्षण मंडल, महाकौशल प्रांत उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) रवीन्द्र नाथ तिवारी ने की।
कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती पूजन एवं माल्यार्पण से हुआ। तत्पश्चात ध्येय श्लोक का वाचन डॉ. प्रियंका जायसवाल द्वारा तथा ध्येय वाक्य एवं भारतीय शिक्षण मंडल का परिचय डॉ. सतीश मिश्रा द्वारा प्रस्तुत किया गया।
संगोष्ठी आयोजक डॉ. सतीश मिश्र, प्रांत सहमंत्री, भा.शि.म., महाकौशल प्रांत ने भारतीय शिक्षण मंडल का परिचय देते हुए बताया कि यह एक राष्ट्रीय स्तर की वैचारिक संस्था है, जिसकी स्थापना रामनवमी के दिन हुई थी। इसका उद्देश्य भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा व्यवस्था को प्रोत्साहित करना तथा अनुसंधान को समाजोन्मुख बनाना है। उन्होंने कहा कि देश की 65 प्रतिशत युवा आबादी ही विकसित भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। युवाओं की सक्रिय सहभागिता के बिना 2047 का लक्ष्य अधूरा रहेगा।


कार्यक्रम के दौरान महाविद्यालय की ओर से प्राचार्य प्रो. (डॉ.) रवीन्द्र नाथ तिवारी द्वारा मुख्य अतिथि आचार्य राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी एवं विशिष्ट अतिथि प्रो. सुरेन्द्र सिंह परिहार को सनातन संस्कृति के पावन प्रतीक तुलसी-वृक्ष सादर भेंट किया गया। यह पावन तुलसी-रोपण स्वस्थ जीवन, सात्त्विक चिंतन एवं राष्ट्रकल्याण की अखंड भावना का प्रतीक स्वरूप समर्पित किया गया।
महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) रवीन्द्र नाथ तिवारी ने स्वागत उद्बोधन एवं संगोष्ठी विषय के संदर्भ में कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने विश्व में नई क्रांति ला दी है। अंतरिक्ष अनुसंधान, जैव विज्ञान, दूरसंचार एवं अन्य वैज्ञानिक क्षेत्रों में भारत आज महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के माध्यम से भारत अन्य देशों के उपग्रह प्रक्षेपित कर अपनी उन्नत तकनीकी क्षमता का प्रभावशाली प्रदर्शन कर रहा है, जो विकसित भारत की दिशा में हमारी वैज्ञानिक प्रगति का प्रमाण है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि भारतीय शिक्षण मंडल भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा, मातृभाषा के संवर्धन तथा शोधोन्मुख चिंतन को प्रोत्साहित करते हुए राष्ट्रनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अनुसंधान, नवाचार और संस्कारयुक्त शिक्षा के समन्वय से ही विकसित भारत 2047 का लक्ष्य साकार किया जा सकता है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. सुरेन्द्र सिंह परिहार ने कहा कि भारत विश्व अर्थव्यवस्था में तेजी से आगे बढ़ रहा है। जापान को पीछे छोड़ते हुए भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था की अग्रणी श्रेणी में पहुंच चुका है। उन्होंने बताया कि भारत सरकार द्वारा अनुसंधान, विकास एवं नवाचार के लिए एक लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने में सहायक होगा। उन्होंने यह भी कहा कि ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में भारत की स्थिति निरंतर बेहतर हो रही है।
अपने उद्बोधन में मुख्य अतिथि आचार्य राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी ने विकसित भारत 2047 की संकल्पना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि देश की 15 से 59 वर्ष आयु वर्ग की कार्यशील जनसंख्या अपनी कौशल क्षमता, उत्पादकता, नवाचार क्षमता एवं बौद्धिक विकास को निरंतर उन्नत करे, तो भारत निश्चित रूप से विकसित राष्ट्र के रूप में विश्व मंच पर स्थापित हो सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विकास का वास्तविक अर्थ केवल GDP में वृद्धि नहीं है, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसर और सम्मानजनक जीवन की उपलब्धता सुनिश्चित करना ही सच्चा समग्र विकास है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों का दायित्व केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में शोधाभिरुचि, नवाचार चेतना, उद्यमशीलता और नैतिक मूल्यों का विकास करना है। शिक्षक समाज के शिल्पी होते हैं; उनके मार्गदर्शन, आचरण और दृष्टि से ही राष्ट्र का भविष्य आकार लेता है। यदि शिक्षक स्वयं सतत अध्ययनशील, शोधोन्मुख और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्ध रहें, तो वे विद्यार्थियों को केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि भी प्रदान कर सकते हैं।
आचार्य तिवारी ने यह भी कहा कि विकसित भारत का स्वप्न तभी साकार होगा जब शिक्षक, विद्यार्थी और समाज तीनों मिलकर उत्तरदायित्वपूर्ण सहभागिता निभाएँ तथा शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण का सशक्त माध्यम बनाएं।
कार्यक्रम में यह भी चिंता व्यक्त की गई कि कक्षाओं में जहां वर्ष 2008 में सेमेस्टर प्रणाली के प्रारंभिक वर्षों में 90 प्रतिशत तक उपस्थिति रहती थी, वहीं वर्तमान में यह घटकर 30-40 प्रतिशत रह गई है। विद्यार्थियों को नियमित अध्ययन, अनुशासन एवं लक्ष्यबद्ध प्रयास के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में योगदान देना चाहिए। द्वापर युग का उदाहरण देते हुए वक्ताओं ने कर्मप्रधान जीवनशैली अपनाने का संदेश दिया।
कार्यक्रम के दौरान मुख्य अतिथि आचार्य राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी, विशिष्ट अतिथि प्रो. सुरेन्द्र सिंह परिहार एवं अध्यक्षता कर रहे प्राचार्य प्रो. (डॉ.) रवीन्द्र नाथ तिवारी का महाविद्यालय परिवार द्वारा शाल एवं श्रीफल भेंट कर आत्मीय सम्मान किया गया।
इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह ने करतल ध्वनि से अतिथियों का अभिनंदन किया तथा उनके मार्गदर्शन को महाविद्यालय के लिए प्रेरणास्रोत बताया।



















































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