Deluge in Nepal following glacier collapse; China also launches major rescue operation.
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नेपाल में ग्लेशियर टूटने के बाद जल प्रलय, 579 लोगों की मौत और हजारों लापता; चीन ने भी शुरू किया बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन

Deluge in Nepal following glacier collapse; China also launches major rescue operation.

काठमांडू/बीजिंग। हिमालयी क्षेत्र में 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी बाढ़ ने नेपाल और चीन के सीमावर्ती इलाकों में भारी तबाही मचा दी है। नेपाल-चीन सीमा के पास ग्लेशियर और चट्टानों के बड़े हिस्से के अचानक खिसकने के बाद नदी में पानी और मलबे का ऐसा सैलाब आया कि देखते ही देखते गांव, सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और कई महत्वपूर्ण ढांचे इसकी चपेट में आ गए।

नेपाल के विदेश मंत्रालय के 28 अगस्त 2026 को 15:30 बजे जारी आधिकारिक अपडेट के अनुसार, नेपाल में अब तक 538 शव बरामद किए जा चुके हैं। वहीं स्थानीय लोगों और विदेशी पर्यटकों समेत बड़ी संख्या में लोग अभी भी लापता हैं। मंत्रालय के अनुसार 33 देशों के 632 लोगों में से 121 लोगों का पता लगाया जा चुका है, जबकि 511 लोग अभी भी लापता बताए गए हैं।

हालांकि, बाद की अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग में नेपाल और तिब्बत को मिलाकर मृतकों की संख्या 579 या उससे अधिक बताई गई है। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी पांच मौतों और सैकड़ों लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। आंकड़ों में अंतर इसलिए है क्योंकि दुर्गम इलाकों में राहत और शव बरामदगी का काम लगातार जारी है और अलग-अलग समय पर आंकड़े अपडेट किए जा रहे हैं।

कैसे शुरू हुई नेपाल में इतनी बड़ी तबाही?

यह घटना सामान्य मानसूनी बाढ़ से अलग मानी जा रही है। प्रारंभिक वैज्ञानिक विश्लेषण के मुताबिक, हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आया। इसके साथ बर्फ, चट्टान और भारी मात्रा में मलबा नदी घाटी में पहुंचा।

अचानक जमा हुए इस मलबे ने नदी के प्रवाह को कुछ समय के लिए रोक दिया। इसके बाद जब प्राकृतिक अवरोध टूटा तो पानी और मलबे का विशाल प्रवाह नीचे की ओर तेजी से बढ़ा।

अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण USGS के प्रारंभिक विश्लेषण के मुताबिक घटना की शुरुआत संभवतः ग्लेशियर के टूटने से हुई और इसके बाद बना मलबे का प्रवाह लगभग 100 किलोमीटर तक आगे बढ़ा। इसका असर नेपाल के भोटे कोशी और त्रिशूली नदी तंत्र के साथ-साथ चीन के ग्यिरोंग पोर्ट क्षेत्र तक पहुंचा।

शुरुआत में कुछ रिपोर्टों में इस घटना को भूकंप से जोड़कर देखा गया था। लेकिन बाद के वैज्ञानिक विश्लेषण में संकेत मिला कि जिस भूकंपीय गतिविधि को पहले भूकंप माना गया, वह वास्तव में बड़े पैमाने पर हुए भूस्खलन और ग्लेशियर-चट्टान के अचानक खिसकने से पैदा हुई ऊर्जा हो सकती है।

भोटे कोशी से त्रिशूली तक तबाही

सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में नेपाल का रसुवा जिला शामिल है। यहां तिमुरे और स्याफ्रुबेसी जैसे इलाकों में भारी नुकसान हुआ। इसके बाद बाढ़ और मलबा नुवाकोट तथा धादिंग की ओर बढ़ा।

भोटे कोशी और त्रिशूली नदी के किनारे बसे कई इलाकों में पानी और मलबे ने घरों, वाहनों और अन्य संपत्तियों को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया।

रिपोर्टों के मुताबिक बाढ़ ने करीब 19 पुलों और लगभग 40 किलोमीटर सड़कों को नुकसान पहुंचाया या बहा दिया। कई इलाकों का संपर्क पूरी तरह टूट गया।

दुर्गम पहाड़ी इलाकों में सड़क और पुल टूट जाने के कारण राहत दलों के लिए प्रभावित स्थानों तक पहुंचना सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।

हाइड्रोपावर परियोजनाओं को भी भारी नुकसान

नेपाल की अर्थव्यवस्था में जलविद्युत परियोजनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है और इस आपदा ने इस क्षेत्र को भी बड़ा झटका दिया है।

रिपोर्टों के अनुसार बाढ़ से करीब 15 हाइड्रोपावर परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं और लगभग 431 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता अस्थायी रूप से प्रभावित हुई है।

रसुवागढ़ी, चिलिमे और सान्जेन जैसी परियोजनाओं को नुकसान की जानकारी सामने आई है। इससे न केवल तत्काल बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ है बल्कि नेपाल के ऊर्जा और बुनियादी ढांचे पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

हजारों लोगों को बचाने में जुटी नेपाली सेना और पुलिस

नेपाल सरकार ने सेना, पुलिस, स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य एजेंसियों को बड़े पैमाने पर राहत एवं बचाव अभियान में लगाया है।

हेलीकॉप्टरों के जरिए उन इलाकों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है जहां सड़क संपर्क टूट चुका है। प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने के साथ-साथ भोजन, दवाइयां, टेंट और अन्य जरूरी सामान पहुंचाया जा रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार हजारों सुरक्षाकर्मी अभियान में लगाए गए हैं और बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। ऊपरी त्रिशूली हाइड्रोपावर परियोजना के एक सुरंग क्षेत्र में फंसे सैकड़ों लोगों को भी बचाने की जानकारी सामने आई है।

33 देशों के लोग लापता, विदेशी नागरिकों की संख्या ने बढ़ाई चिंता

इस आपदा का एक गंभीर पहलू यह है कि प्रभावित क्षेत्र केवल स्थानीय आबादी तक सीमित नहीं था। यह इलाका नेपाल से तिब्बत और कैलाश-मानसरोवर की ओर जाने वाले यात्रियों तथा ट्रेकिंग मार्गों के लिए भी महत्वपूर्ण है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय के 28 अगस्त के आंकड़ों के मुताबिक 33 देशों से जुड़े 632 लोगों में से 511 लोग अभी भी लापता हैं। यह संख्या आगे जांच और पहचान के साथ बदल सकती है।

इससे पहले नेपाल सरकार ने बताया था कि भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा समेत कई देशों के नागरिकों का संपर्क टूट गया था। चीन ने भी बताया था कि नेपाल में करीब 100 चीनी नागरिकों के बारे में जानकारी की पुष्टि की जा रही थी।

चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी भारी नुकसान

नेपाल के साथ ही चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में स्थित ग्यिरोंग काउंटी और ग्यिरोंग पोर्ट भी इस आपदा से प्रभावित हुए हैं।

चीनी अधिकारियों के शुरुआती आंकड़ों में तीन मौतों और 265 लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई थी। बाद में चीन की ओर से विदेशी नागरिकों समेत बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई।

ग्यिरोंग पोर्ट नेपाल और चीन के बीच महत्वपूर्ण सीमा व्यापार तथा आवागमन मार्गों में शामिल है। बाढ़ और मलबे के कारण इस क्षेत्र का बुनियादी ढांचा भी प्रभावित हुआ है।

चीन सरकार ने क्या कहा?

चीन सरकार ने आपदा के तुरंत बाद अपने बचाव और राहत तंत्र को सक्रिय कर दिया।

चीनी विदेश मंत्रालय के अनुसार राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने घटना को गंभीरता से लेते हुए तत्काल बचाव अभियान तेज करने, प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने, घायलों का इलाज करने और द्वितीयक आपदा को रोकने के निर्देश दिए।

चीन ने राष्ट्रीय स्तर पर आपदा राहत के लिए Level-II emergency response सक्रिय किया, जबकि तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र ने प्राकृतिक आपदा के लिए Level-I emergency response शुरू किया। सेना, सशस्त्र पुलिस, अग्निशमन, सीमा सुरक्षा और अन्य बचाव दलों को प्रभावित क्षेत्र में भेजा गया।

चीन के उपप्रधानमंत्री झांग गुओछिंग भी घटनास्थल पर पहुंचे और राहत एवं बचाव अभियान की निगरानी की। प्रधानमंत्री ली छ्यांग ने भी प्रभावित क्षेत्र का दौरा कर बचाव कार्यों का जायजा लिया।

शी जिनपिंग ने नेपाल के प्रति जताई संवेदना

28 अगस्त को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने नेपाल में हुई इस भीषण आपदा पर नेपाली राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को संवेदना संदेश भेजा।

चीनी सरकार की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक शी ने पीड़ितों के प्रति गहरी संवेदना जताते हुए कहा कि चीन लापता लोगों की तलाश, प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और घायलों के उपचार के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है।

चीन ने यह भी कहा कि वह नेपाल के राहत एवं बचाव अभियान के लिए आपातकालीन सहायता उपलब्ध कराने और अंतरराष्ट्रीय बचाव सहयोग के लिए तैयार है।

चीन की 28 अगस्त की उच्चस्तरीय बैठक में भी नेपाल के आपदा प्रभावित क्षेत्रों को आपातकालीन सहायता देने और अंतरराष्ट्रीय आपदा-प्रबंधन सहयोग बढ़ाने का निर्णय दोहराया गया।

नेपाल और चीन दोनों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

सबसे बड़ी चिंता केवल पहली बाढ़ की नहीं है। प्रभावित क्षेत्र में ग्लेशियर, भूस्खलन और अस्थिर पहाड़ी ढलानों के कारण दूसरी आपदा का खतरा भी बना हुआ है।

भूस्खलन से कुछ स्थानों पर पानी जमा होकर अस्थायी झील या barrier lake बन गई है। यदि ऐसी झील का प्राकृतिक अवरोध टूटता है तो नीचे के इलाकों में दोबारा अचानक बाढ़ आ सकती है।

इसी खतरे को देखते हुए नेपाल और चीन दोनों की एजेंसियां नदी के जलस्तर, पहाड़ों की स्थिरता और संभावित अवरोधित झीलों पर निगरानी रख रही हैं। चीन की सरकार ने भी इस तरह की झीलों और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों की लगातार निगरानी और early warning को प्राथमिकता देने की बात कही है।

नेपाल ने विदेशी रेस्क्यू टीमों को लेकर बदला रुख

आपदा के बाद भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और अन्य देशों की ओर से खोज एवं बचाव सहायता की पेशकश की गई थी।

शुरुआत में नेपाल सरकार ने कहा कि उसके सुरक्षा एवं बचाव बल स्वयं अभियान संभालने में सक्षम हैं और फिलहाल विदेशी खोज एवं बचाव टीमों की जरूरत नहीं है। इसके बजाय विदेशों से मिलने वाली सहायता को एक केंद्रीकृत व्यवस्था के माध्यम से लेने की बात कही गई।

हालांकि 28 अगस्त की शाम तक सामने आई रिपोर्टों के अनुसार नेपाल सरकार ने अपना रुख बदला है और कुछ विशेष अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को सहायता देने की अनुमति देने पर सहमति बनी है। विशेष रूप से सुरंग बचाव और शवों की पहचान जैसे कार्यों में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञता लेने की संभावना बताई गई है।

यह घटनाक्रम लगातार बदल रहा है और अंतिम व्यवस्था नेपाल सरकार के अगले आधिकारिक निर्णय पर निर्भर करेगी।

भारत पर भी मंडराया बाढ़ का खतरा

नेपाल की नदियों में आई इस बाढ़ का असर केवल नेपाल तक सीमित नहीं है। त्रिशूली नदी आगे चलकर नारायणी नदी प्रणाली से जुड़ती है, जो भारत में गंडक के रूप में जानी जाती है।

इसी वजह से भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश समेत नदी के निचले इलाकों में भी जलस्तर को लेकर सतर्कता बढ़ाई गई। नेपाल से आने वाले पानी के कारण संभावित बाढ़ को देखते हुए निचले इलाकों में प्रशासन ने निगरानी और बचाव तैयारियां बढ़ाईं।

कुछ रिपोर्टों में भारत के उत्तर प्रदेश में आपदा से जुड़े शव मिलने की जानकारी भी सामने आई है।

क्या यह जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चेतावनी है?

नेपाल की यह त्रासदी हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जलवायु जोखिम को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार तापमान में वृद्धि से ग्लेशियरों और ऊंचाई वाले क्षेत्रों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इसके कारण ग्लेशियर झीलों, बर्फ और पहाड़ी ढलानों से जुड़े खतरे बढ़ सकते हैं।

हालांकि किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बदलते हिमालयी पर्यावरण में early warning systems, satellite monitoring और disaster preparedness को मजबूत करना बेहद जरूरी है।

नेपाल के सामने अब राहत के बाद पुनर्निर्माण की बड़ी चुनौती

बचाव अभियान पूरा होने के बाद नेपाल को एक और बड़ी चुनौती का सामना करना होगा—पुनर्निर्माण।

सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं, घर, स्थानीय व्यापारिक प्रतिष्ठान और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं क्षतिग्रस्त हुई हैं। कई इलाकों में संपर्क बहाल करने में लंबा समय लग सकता है।

नेपाल सरकार ने नुकसान का व्यापक आकलन शुरू करने की दिशा में कदम उठाए हैं। आर्थिक नुकसान का वास्तविक आंकड़ा राहत एवं बचाव अभियान के बाद ही सामने आने की संभावना है।

अभी क्या है नेपाल का सबसे बड़ा फोकस?

फिलहाल नेपाल सरकार की प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं—

  • लापता लोगों की तलाश
  • घायलों को चिकित्सा सुविधा
  • प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना
  • खाद्य सामग्री और दवाओं की आपूर्ति
  • नदी और barrier lake की निगरानी
  • टूटे संपर्क मार्गों को बहाल करना
  • विदेशी नागरिकों की पहचान और उनके दूतावासों से समन्वय
  • प्रभावित क्षेत्रों में दूसरी बाढ़ या भूस्खलन को रोकने के लिए चेतावनी व्यवस्था मजबूत करना

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भी कहा है कि सरकार उपलब्ध सभी संसाधनों का इस्तेमाल खोज, बचाव और राहत अभियान में कर रही है तथा स्थिति के अनुसार सहायता की जरूरतों का आकलन किया जा रहा है।

नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त को आई यह आपदा हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती प्राकृतिक अस्थिरता की एक गंभीर तस्वीर सामने लाती है। ग्लेशियर का टूटना, उसके बाद मलबे का तेज बहाव, नदियों में अचानक आई बाढ़ और फिर पुलों, सड़कों तथा बस्तियों का तबाह होना—इन सभी घटनाओं ने कुछ ही घंटों में हजारों परिवारों की जिंदगी बदल दी।

28 अगस्त 2026 तक नेपाल में 538 शव बरामद होने की आधिकारिक जानकारी है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेपाल और तिब्बत को मिलाकर मृतकों की संख्या 579 तक पहुंचने की रिपोर्ट है। सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों लोगों के अभी भी लापता होने के कारण अंतिम आंकड़ा और बढ़ सकता है।

नेपाल अपने सुरक्षा बलों के जरिए बड़े स्तर पर राहत और बचाव अभियान चला रहा है। दूसरी ओर चीन ने भी अपने उच्चतम स्तर पर राहत एवं बचाव अभियान सक्रिय करते हुए नेपाल को आपातकालीन सहायता और अंतरराष्ट्रीय बचाव सहयोग देने की पेशकश की है।

सबसे बड़ी चिंता अब यह है कि प्रभावित पहाड़ी क्षेत्रों में कहीं दूसरी बाढ़, भूस्खलन या barrier lake के टूटने जैसी घटना न हो। इसलिए आने वाले कुछ दिन राहत और बचाव के साथ-साथ द्वितीयक आपदा की निगरानी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं।

Written by
Zeeshan Javed

Zeeshan Javed is a Rewa-based journalist covering crime and public issues. He reports on local developments with a focus on verified and factual news.

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